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Jai Gurudev!

A Poem Inspired by and Dedicated to Gurudev!


ज़िन्दगी की शुरुआत न मेरी मर्ज़ी से; 
न अंत मेरी मर्ज़ी का;
नासमझ हूँ; 
इस बीच का फासला समझने की कोशिश करता हूँ मैं;
जीना सीख रहा हूँ मैं; 
खुशनसीब हूँ; इस राह पर तुम मिल गए;
शिकायत सिर्फ इतनी है; तुम पहले क्यों नहीं मिले!

एक अणु था; राख हो जाऊँगा मैं;
तुमसे ही आया था; तुममें ही विलीन हो जाऊँगा मैं;
बाधाएं तो हैं; उन्हें लांघने का हौसला हो तुम;
तुम्हारे बिना ये बोझ ना ढ़ो पाऊँगा मैं!

कहानी है ज़िन्दगी; एक अभिनेता हूँ मैं;
तुम्हारे निर्देशित चलचित्र का एक पात्र  हूँ मैं;
इस कहानी के साथ होगा मेरे पात्र का अंत;
फिर एक नई कहानी में नया किरदार निभाने आऊँगा मैं।

प्रार्थी हूँ मैं; सारथि हो तुम;
इस धरती को सूरज की आरती हो तुम;
जल, वायु और आकाश भी तुम;
ज्ञाता, ज्ञात और ज्ञान भी तुम;
मेरे विचार, मेरे कर्म, मेरी आत्मा भी तुम;
अंतर, अंत और अनंत भी तुम!

रेंग रहा था, चल रहा था, अब उड़ान भर चला हूँ मैं;
कृतज्ञ हूँ; इस अनंत का अंश हूँ मैं;
की थी शब्दों से शुरुआत; अब निशब्ध हूँ मैं;
बस… अब निशब्ध हूँ मैं।